दूध के धुले नहीं होते लोकायुक्त

संपूर्ण क्रांति आंदोलन (1974) में भ्रष्टाचार अहम मुद्दा था। जेपी कहते थे कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री ऊपर से बहती है, लिहाजा अगर लोकायुक्त संस्था की स्थापना हो जाए तो भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है। शायद तत्कालीन शासक वर्ग ज्यादा स्मार्ट था, इसलिए उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में धीरे-धीरे लोकायुक्त की स्थापना कर दी गई।

 

आपातकाल की समाप्ति पर जेल से निकलने के बाद मैंने समाज सेवा के उद्देश्य से पत्रकारिता का पेशा चुना। नवंबर 1983 में दैनिक ‘अमृत प्रभात’ में मुझे एक बड़ी न्यूज ब्रेक का अवसर मिला। जमीन मालिकों और बड़े अफसरों ने मिलकर अर्बन लैंड सीलिंग की आठ हजार से अधिक फाइलें गायब कर दी थीं। इस तरह उनकी जमीनें सीलिंग में जाने से बच गई। बहुतों की जमीन पर मल्टीस्टोरी इमारतें खड़ी हो गईं। नक्शा पास करने की एवज में अफसरों ने पैसा खाया। कुछ इतने बेधड़क थे कि इन इमारतों में जगह भी ले ली। मेरी खबर पर विधानसभा में खूब हंगामा हुआ। जांच रिपोर्टें आईं, मगर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई।

नाम बड़े, दर्शन छोटे

कुछ समय बाद धर्म सिंह रावत संबद्ध विभाग के निदेशक बने, जो ईमानदारी के लिए मशहूर थे। उन्होंने मामले में कार्रवाई के लिए सरकार को कई पत्र लिखे। हारकर पहले अपने दफ्तर और फिर गांधी प्रतिमा के सामने धरने पर बैठे। मगर सरकार ने उस ईमानदार अफसर को अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया। 1983 से 1986 तक लगातार खबर लिखने का भी कोई असर नहीं हुआ। मुझे लगा कि क्यों न लोकायुक्त को आजमाया जाए, जिसके लिए हमने आंदोलन किया था। यह 1986 की बात है। तत्कालीन लोकायुक्त ने मेरी शिकायत पर बड़ी तत्परता दिखाई। एक मंत्री समेत करीब डेढ़ दर्जन अफसरों से जवाब-तलब हुआ।

मैंने अपनी शिकायत के साथ सबूत के तौर पर जांच रिपोर्टें भी लगाई थीं। पहली बार लोकायुक्त कार्यालय में हलचल शुरू हुई। घबराए अफसरों ने लोकायुक्त कार्यालय में नीचे से ऊपर तक सबकी सेवा शुरू कर दी। लोकायुक्त ने गवाही पूरी हुए बिना बीच में ही मामला समाप्त कर दिया। बदले में सरकार ने रातोंरात अध्यादेश लाकर लोकायुक्त का कार्यकाल पांच से बढ़ाकर छह साल कर दिया। जब मैंने लोकायुक्त से पूछा कि आपने जांच कैसे समाप्त कर दी, तो उन्होंने कहा कि मैं दरखास्त दे दूं तो वह दोबारा जांच शुरू कर देंगे। मैंने दो टूक जवाब दिया कि उन्हें दोबारा बेईमानी से फायदा लेने का मौका मैं नहीं देने वाला। उनकी बेईमानी के किस्से देश भर के अखबारों में छपे और विधान सभा में भी जमकर चर्चा हुई।

अब वर्तमान पर नजर डालें। यूपी के मौजूदा लोकायुक्त की नियुक्ति समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार ने मार्च 2006 में की थी। छह साल बाद जब उनका कार्यकाल समाप्त हुआ, तब एसपी दोबारा सत्ता में आ गई। कानून में संशोधन कर उनका कार्यकाल आठ साल कर दिया गया। कानून में एक अद्भुत व्यवस्था यह भी कर दी गई है कि जब तक नया लोकायुक्त नहीं आएगा, पुराने लोकायुक्त अपने पद पर बने रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में इस कानून को वैध ठहराकर नए लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए कहा है। नए लोकायुक्त की नियुक्ति में मुख्यमंत्री, राज्यपाल और हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के बीच जो खींचतान चल रही है, उसका विवरण रोज अखबारों में छप रहा है। नया लोकायुक्त नियुक्त न हो पाने से वर्तमान लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा नौ साल से अधिक समय से पद पर जमे हैं। भारत में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।

जरा अन्य राज्यों पर निगाह डालें। मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने दस सालों तक गुजरात में किसी को लोकायुक्त नहीं बनने दिया था। इसी मुद्दे पर सत्ता में आए अरविंद केजरीवाल ने अभी तक दिल्ली में लोकायुक्त बनाने की जरूरत नहीं समझी है। कुछ दिनों पहले पता चला कि कर्नाटक में लोकायुक्त के सुपुत्र उनके दफ्तर और घर से धन उगाही का धंधा चला रहे थे। बेटा और उसके साथी अब जेल में हैं और विधानसभा को लोकायुक्त हटाने का कानून बनाना पड़ा। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज ही प्राय: लोकायुक्त बनते हैं। यह कहना अदालत की अवमानना नहीं होगा कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों पर भी करप्शन के गंभीर आरोप लग चुके हैं। यह स्थिति तब है जब जजों की नियुक्ति अब तक जज ही करते रहे हैं। लोकायुक्त की नियुक्ति की जो व्यवस्था है उसमें तो राजनीतिक पहुंच के बिना किसी के नाम पर विचार ही नहीं हो सकता।

पहले राजनीति सुधरे

असल में कुछ पदों के साथ पवित्रता का भाव जुड़ गया है। हमें लगता है कि कि सीबीआई, सतर्कता आयुक्त, अदालतें और लोकायुक्त भ्रष्टाचार खत्म करके लोगों को न्याय दिलाएंगे। अब बैंकों व दूसरी संस्थाओं में भी देखादेखी लोकायुक्त या रेगुलेटर नियुक्त किए जा रहे हैं। हम इन संस्थाओं पर अरबों का बजट खर्च करते हैं। लेकिन वास्तव में ये सब हाथी के दिखाने वाले दांत ही हैं। सिद्धांत रूप में लोकायुक्त संस्था विधायिका के प्रतिनिधि के रूप में काम करती है। उसका काम शिकायतों की जांच करके रिपोर्ट देना भर है। इसलिए अनुभव बताता है कि जब तक राजनीति शुद्ध नहीं होगी और ईमानदार लोग बहुतायत में संसद और विधान सभाओं में नहीं पहुंचेंगे, तब तक न भ्रष्टाचार कंट्रोल में होगा और न लोगों को न्याय मिलेगा।

Published here– https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/lokayuktas-are-also-tainted/

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