प्रयाग महाकुंभ की तैयारियां शुरु

इलाहाबाद के संगम तट पर होने वाला महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक मेला होता है. प्रयाग में अगला महाकुंभ दिसंबर 2012 और जनवरी 2013 में होना है.

इतने बड़े मेले के आयोजन में ढेर सारी व्यवस्था करनी होती है. इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी से अगले कुंभ की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ 12 साल पहले वर्ष 2001 में सदी के पहले महाकुंभ के दौरान एक महीने में कुल मिलाकर करीब आठ करोड़ लोगों ने गंगा स्नान किया था. दुनिया के कोने कोने से आए थे ये लोग.

लाखों लोगों के लिए गंगा और यमुना के संगम पर रेत और कछार में टेंट का अस्थायी नगर बसाकर कुंभ मेले की व्यवस्था करना अपने आप में एक बड़ा चुनौती भरा कार्य है. इसलिए कुंभ मेले की तैयारी तीन साल पहले शुरू हो जाती है.

इलाहाबाद के कमिश्नर पीवी जगन मोहन कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों की सुख सुविधा का बन्दोबस्त करना सबसे बड़ा काम है.

जगन मोहन कहते हैं, ”जनता जनार्दन जब श्रृद्धा सहित दर्शन और पूजा पाठ के लिए यहाँ आते हैं तो उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है शुद्ध पेयजल, रहने की व्यवस्था, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, उनकी सुरक्षा और बिजली की व्यवस्था. ये सब बातें महत्वपूर्ण होती हैं. ”

व्यवस्थाएँ

जगन मोहन के अनुसार जिला प्रशासन ने प्रस्तावित कुंभ मेले की रूप रेखा तैयार करके राज्य सरकार को भेज दिया है. इसमें गंगा और यमुना के प्रदूषण की रोक थाम, इलाहाबाद शहर और उस पार झूंसी, अरैल और फाफामऊ आदि में सड़क, पुल ओवर ब्रिज तथा अन्य नागरिक सुविधाओं का निर्माण, संगम क्षेत्र में किले के समीप पक्का घाट, बस अड्डों का विस्तार, पेय जल, सफाई, सीवर और बिजली व्यवस्था में सुधार आदि कार्य शामिल हैं.

मेले के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यातायात का संचालन होता है जिससे सब लोग स्नान भी कर सकें और भगदड़ न हो. 1954 में हुई भगदड़ में लगभग आठ सौ लोग मारे गए थे और सौ घायल हो गए.

उसके बाद से कुंभ के मुख्य स्नान पर्वों पर वीआईपी दर्जा प्राप्त लोगों के आने पर मनाही रहती है. फिर भी बड़े नेता, अफसर और जज वगैरह न केवल स्नान के लिए आना चाहते हैं, बल्कि कार से स्नान घाट या अपने वीआईपी टेंट तक जाना चाहते हैं.

मीडिया का कुँभ

इसी तरह देश विदेश के मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और फोटोग्राफर्स को संभालना भी मेला प्रशासन के लिए एक मुश्किल काम होता है.

कुंभ मेले की व्यवस्था में चालीस विभाग लगते हैं. पुलिस फ़ोर्स को मिलाकर करीब एक लाख लोग इसकी व्यवस्था संभालते हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार में नगर विकास विभाग इन सबका समन्वय करता है. विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन ने बताया कि इलाहाबाद जिला प्रशासन ने कुंभ मेले का जो बजट अनुमान भेजा है, उसे परिक्षण के लिए केन्द्रीय योजना आयोग को भेजा गया है.

आलोक रंजन के अनुसार, ”प्रारंभिक एस्टीमेट दो हजार करोड़ रूपये का बन गया है और केन्द्रीय योजना आयोग इसका परिक्षण कर रहा है. हम अपेक्षा करते हैं कि योजना आयोग भी इसमें उचित सहायता देगा क्योंकि जब हरिद्वार में पिछला कुंभ हुआ था, तो योजना आयोग से सीधे सहायता मिली थी. प्रयास कर रहे हैं कि कार्य अभी से शुरू हो जाएँ ताकि समय से यह कार्य पूरा हो सके.”

प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुहिम

अधिकारियों के अनुसार इलाहाबाद के पिछले कुंभ में केन्द्र सरकार ने 57 करोड रूपए की आर्थिक सहायता दी थी जबकि पिछले साल हरिद्वार कुंभ में योजना आयोग ने 500 करोड़ रूपए की सहायता दी. राज्य सरकार ने फिलहाल अपने बजट में कुंभ के लिए 125 करोड़ रूपए का प्रावधान कर दिया है.

इस बजट से इलाहाबाद शहर और मेला क्षेत्र में अनेक निर्माण और विकास कार्य होंगे.

लेकिन लोगों का कहना है कि सदियों से चले आ रहे महाकुंभ मेले का मुख्य आकर्षण का त्रिवेणी संगम पर गंगोत्री यमुनोत्री से आने वाला शुद्ध जल और यहाँ का स्वच्छ पर्यावरण रहा है जिसमे लोग स्नान, ध्यान और तप कर सकें.

गंगा प्रदूषण के खिलाफ वर्षों से संघर्ष कर रहे स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी कहते हैं कि महाकुंभ मेले के लिए, ”गंगा जी ही सर्वोच्च हैं. लोग आते हैं गंगा जी के नाम पर.”

स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी शासन और प्रशासन दोनों को चेतावनी देना चाहते हैं.

वो कहते हैं, ”जहां करोड़ों संत, महात्मा और श्रृद्धालु आएंगे और जिसके लिए यहाँ आएँगे, अगर उनका अभाव रहा, उनसे दर्शन न हुआ, उनसे स्नान न हुआ और उनसे पान न हुआ तो इस प्रदूषण के लिए कोई न आएगा और न कोई दर्शन करेगा. विशेष रूप से लोग आहत होकर यहाँ से जाएंगे.”

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्रोफ़ेसर गंगा में प्रदूषण के खिलाफ जन चेतना जागृत करने का काम करते हैं.

प्रोफ़ेसर दीनानाथ शुक्ल इस बात से चिंतित हैं कि वर्तमान में गंगा और यमुना का हिमालय से आने वाला शुद्ध जल ऊपर ही रोक कर पेय जल या सिंचाई के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है.

शुक्ल कहते हैं, ”इस समय कन्नौज और कानपुर के बाद इलाहाबाद में गंगा का जो जल बह रहा है, वह शुद्ध नालों का जल है, कल कारखानों का जल है या नहरों का जल है. उसमे गंगा (गंगोत्री ) का जल है ही नही. इसलिए सबसे पहले तो उस गंगा के परिप्रेक्ष्य में विचार करने की ज़रुरत है जिसके लिए कुंभ लगता है, जो अमृत की बूँदें हैं. गंगा जीवनदायिनी है, गंगा अमृत धारा कहलाती है. कम से कम वह गंगा तो आगे आए. उसको चाहे टिहरी से छोड़ें, हरिद्वार या नरोरा से छोड़ें.”

कई संत महात्मा और नागरिक हिमालय की गंगोत्री- यमुनोत्री से आने वाला जल संगम तक लाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करते रहे हैं और अदालत ने आदेश भी दिए. लेकिन अभी तक इस जल के उपयोग का कोई न्यासंगत और तर्कसंगत फार्मूला तय नही हो पाया.

नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन आश्वासन देते हैं कि सरकार कुंभ में आने वाले तीर्थ यात्रियों को शुद्ध गंगा जल उपलब्ध कराएगी.

आलोक कहते हैं, ”गंगाजल बिलकुल मिलेगा. इसके लिए नरोरा से अधिक से अधिक पानी छोड़ने के बारे में माननीय उच्च न्यायालय के भी आदेश हैं और हम लोग भी निर्देश दे रहे हैं. उत्तराखंड से टिहरी बाँध से भी अधिक से अधिक पानी छोड़ने के लिए हम लोग लगातार वहाँ की सरकार के संपर्क में रहते हैं. इसका हम लोग पूरा प्रबंध कर रहे हैं कि पानी उचित मात्रा में रहे और साफ़ रहे जिससे लोग स्नान कर सकें.”

दरअसल गंगा जी ही प्रयाग महाकुंभ मेले के केंद्र में रहती हैं.

पिछले कुंभ मेले के प्रबंधकों में प्रमुख इलाहाबाद के तत्कालीन कमिश्नर सदाकान्त ने अपनी प्रशासनिक रिपोर्ट में लिखा है कि वो कुंभ मेला को एक मानवीय आयोजन नही मानते.

सदाकांत के अनुसार महाकुंभ प्रयाग माँ गंगा द्वारा आयोजित एक दैवीय और आध्यात्मिक महोत्सव है इसीलिए मेले का इंतज़ाम देखने वाले अफसर हमेशा मेला निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए गंगा जी से ही प्रार्थना करते रहते हैं.

 

https://www.bbc.com/hindi/mobile/india/2011/02/110216_kumbh_prep_skj.shtml

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