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पुलिस और अनुशासन

जहॉं एक ओर बहुतेरे पुलिस कर्मियों के व्यवहार से जनता , यानि टैक्सपेयर और उनके असली मालिक , को परेशानी होती है , वहीं दूसरी ओर पर्याप्त रेस्ट या छुट्टियॉं न मिलने से पुलिस के लोग अपने परिवार को समय नहीं दे पाते और तनाव में रहते हैं .

थानों में भी अच्छे मेस और आवास नहीं नहीं हैं .

कप्तान मिलते नहीं हैं या मिलते हैं तो जवानों की बात ठीक से नहीं सुनते या उन पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते . कई अधिकारी दुर्व्यवहार भी करते हैं .

सिपाहियों की अपने स्थायी आवास से बहुत दूर तैनाती भी एक समस्या है .

नई पीढ़ी के पुलिस जवान पढ़े लिखे हैं , उनके साथ पहले जैसा व्यवहार संभव नहीं है .

नागरिक समुदाय भी अब अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक है .

सबसे ज़रूरी है कि हर स्तर पर पर्याप्त संख्या में पुलिस जनों की भर्ती की जाये .

बुनियादी और नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाये .

वैसे तो पत्रकार और पुलिस दोनों चौबीस घंटे काम पर रहते हैं , लेकिन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता के लिए पर्याप्त रेस्ट और अवकाश दिया जाये .

हर थाने या निकटतम स्थान पर समुचित आवास की व्यवस्था की जाये .

पुलिस में या किसी भी फ़ोर्स में अनुशासन और ग़लती के लिए दंड ज़रूरी है , पर साथ में बेहतर प्रशिक्षण , समस्याओं की सुनवाई और ड्यूटी के लिए ज़रूरी साधन एवं सुविधाएँ देना भी ज़रूरी है .

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