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अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी : व्यवस्थागत खामियां, जवाबदेही और पारदर्शिता पर एक नीतिगत विमर्श

राम मंदिर दान विवाद: क्या सार्वजनिक ट्रस्ट ही स्थायी समाधान है?

 

– राम दत्त त्रिपाठी 

अयोध्या में भगवान श्रीराम का मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। देश-विदेश से आने वाले भक्त बड़ी श्रद्धा से दान और चढ़ावा अर्पित करते हैं। ऐसे में राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ियों और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोपों ने स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा की है। प्रश्न केवल कुछ लोगों की गिरफ्तारी या प्रशासनिक कार्रवाई का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान संस्थागत व्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह श्रद्धालुओं के दान की पूरी सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित कर सके?

समस्या व्यक्तियों से अधिक व्यवस्था की है। यदि संस्थागत ढांचा मजबूत नहीं होगा तो भविष्य में भी ऐसी घटनाओं की आशंका बनी रहेगी। इसलिए अब समय केवल दोष तय करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधारने का है।

राम मंदिर में गड़बड़ियां क्यों संभव हुईं?

मंदिर प्रबंधन से जुड़े कई लोगों ने समय रहते वित्तीय अनियमितताओं और खरीद प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था। आरोपों में नकद दान के मिलान, निर्माण सामग्री की खरीद और बहुमूल्य धातुओं के रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थागत कमजोरियों का उल्लेख किया गया।

यदि शुरुआती शिकायतों की स्वतंत्र और प्रभावी जांच समय पर होती तथा जवाबदेही तय की जाती, तो स्थिति शायद यहां तक नहीं पहुंचती।

सबसे बड़ी समस्या: संस्थागत ढांचे की कमजोरी

राम मंदिर का वर्तमान ट्रस्ट एक निजी ट्रस्ट के रूप में कार्य करता है। इतने बड़े धार्मिक संस्थान, जहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु आते हैं और हजारों करोड़ रुपये के दान तथा परिसंपत्तियों का प्रबंधन होता है, वहां आधुनिक वित्तीय नियंत्रण, पेशेवर प्रशासन और स्वतंत्र ऑडिट अत्यंत आवश्यक हैं।

मुख्य चुनौतियां हैं—

  • पेशेवर प्रशासनिक विशेषज्ञता का अभाव
  • स्वतंत्र एवं कठोर ऑडिट प्रणाली की कमी
  • संस्थागत जवाबदेही का सीमित ढांचा
  • आधुनिक डिजिटल निगरानी प्रणाली का अपर्याप्त उपयोग

तिरुपति और वैष्णो देवी मॉडल से क्या सीख मिलती है?

भारत के बड़े धार्मिक संस्थानों ने वर्षों में ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की हैं जिनमें कानून द्वारा स्थापित ट्रस्ट, पेशेवर प्रशासन, नियमित ऑडिट और तकनीकी निगरानी शामिल हैं।

तिरुपति बालाजी और श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का संचालन विशेष कानूनों के अंतर्गत होता है। वहां प्रशासनिक अधिकारियों, वित्तीय विशेषज्ञों और पेशेवर प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी कारण पारदर्शिता और जवाबदेही अपेक्षाकृत अधिक मजबूत मानी जाती है।

क्या राम मंदिर के लिए Statutory Public Trust बनाया जाना चाहिए?

यदि राम मंदिर के लिए संसद या उत्तर प्रदेश विधानसभा के कानून के माध्यम से एक सार्वजनिक वैधानिक ट्रस्ट बनाया जाए, तो इससे कई संस्थागत सुधार संभव हो सकते हैं।

ऐसी व्यवस्था में—

  • पेशेवर प्रबंधन
  • स्वतंत्र ऑडिट
  • डिजिटल लेखा प्रणाली
  • सार्वजनिक जवाबदेही
  • दीर्घकालिक संस्थागत स्थिरता

को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।

पांच नीतिगत सुझाव

  1. संसद या उत्तर प्रदेश विधानसभा विशेष कानून बनाए।
  2. नए ट्रस्ट में प्रशासनिक, कानूनी और वित्तीय विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।
  3. प्रत्येक दान की डिजिटल रसीद और बारकोड आधारित रिकॉर्डिंग हो।
  4. नियमित स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य किया जाए।
  5. सभी प्रमुख वित्तीय सूचनाओं का सार्वजनिक प्रकटीकरण किया जाए।

राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। इसलिए इसके प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

यदि संस्थागत सुधार समय रहते किए जाते हैं तो न केवल श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी राम मंदिर एक आदर्श धार्मिक संस्थान के रूप में स्थापित हो सकेगा।

लेखक परिचय:
राम दत्त त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व बीबीसी संवाददाता हैं। उन्होंने पिछले चार दशकों से अयोध्या, राम जन्मभूमि आंदोलन और उससे जुड़े राजनीतिक एवं विधिक घटनाक्रम की निकटता से रिपोर्टिंग की है।

 

 

Ram Dutt Tripathi

राम दत्त त्रिपाठी : परिचयात्मक विवरण रामदत्त त्रिपाठी, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.  उन्होंने 1992 से 2013 इक्कीस वर्षों तक बी बी सी लंदन के लिए कार्य किया और वह एक प्रकार से भारत मे बी बी सी की पहचान बन गये. वह उन गिने चुने पत्रकारों में से हैं , जो समाज सेवा के मिशन के लिए पत्रकारिता में आये. श्री त्रिपाठी युवावस्था में सर्वोदय और जे पी आंदोलन से जुड़े और लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के चलते इमरजेंसी के दौरान जेल में रहे. श्री त्रिपाठी को अखबार  रेडियो और टी.वी. के अलावा आनलाइन  यानी तीनों प्लेट फार्म्स पर कार्य का अनुभव है। अखबारों में भी वह दैनिक , साप्ताहिक और पाक्षिक तीनों के लिए काम कर चुके हैं। 06 दिसंबरदिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस का सर्वप्रथम समाचार  देने वाले पत्रकार  राम दत्त त्रिपाठी ही थे.  उत्तर भारत और देश की राजनीति  में पिछले डेढ. दशक में जो सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवर्तन आये हैं उनका कवरेज करके  रामदत्त त्रिपाठी ने पत्रकारिता में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है।अयोध्या विवाद, सामाजिक न्याय और दलित अधिकार  आंदोलन उल्लेखनीय घटनाक्रम हैं। पूर्वांचल में  इंसेफलाइटिस की महामारी जैसे विषय को भी श्री त्रिपाठी ने अपनी पैनी नज़रों से विश्वस्तरीय समाचार बनाया।   श्री त्रिपाठी ने पत्रकार के रुप में पर्यावरण, शिक्षा , स्वास्थ्य और खेती   से जुड़े विषयों पर विशेष गहन कार्य किया है।उन्होंने नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम और माओवादी आंदोलन का विस्तृत कवरेज किया। जान का जोखिम लेकर वह पहाड़ी, जंगली गृहयुद्द प्रभावित क्षेत्रों में अन्दर तक गये। माओवादी  नेता प्रचंड का भूमिगत रहते हुए इंटरव्यू किया जबकि उनसे मिलना असंभव और जोखिम भरा काम था. बी.बी.सी. से पहले वह साप्ताहिक संडे मेल, दैनिक अमृत प्रभात और दैनिक भारत से सम्बद्द रहे।  उन्हें युवावस्था में 1973 से 1975 तक इलाहाबाद से प्रकाशित पाक्षिक नगर स्वराज्य में काम करने का मौका मिला जिसकी प्रधान संपादक डा. महादेवी वर्मा, संपादक डा. रघुवंश और प्रकाशक सुप्रसिद्ध गांधीवादी विचारक गणितज्ञ प्रो. बनवारी लाल शर्मा थे.  लोकतंत्र और विचार स्वातंत्र्य की प्रतिबद्दता के चलते श्री त्रिपाठी ने पूरी इमरजेंसी बनारस और नैनी सेंट्रल जेल में गुजारी.1977 में देश में लोक तंत्र की बहाली के बाद बाद समाज सेवा के उद्देश्य से पूर्णकालिक पत्रकार बन गये.  श्री त्रिपाठी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एलएलबी किया है. उन्होंने  पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता शुरू कर दी थी।   अवार्ड  2006 में  त्रिपाठी को पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दीसंस्थान ने गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से सम्मानित किया है. इसमें एक लाख रु नकद शामिल है.  2008 में रामदत्त त्रिपाठी के विशेष कार्यक्रम 'आओ स्कूल चलें' को प्रतिष्ठित एशिया ब्रॉडकास्टिंग यूनियन (एबीयू) अवार्ड के लिए चुना गया .इस कार्यक्रम में भारत में प्राथमिक शिक्षा की हालत की पड़ताल की गई थी. एबीयू मीडिया जगत का प्रतिष्ठित पुरस्कार है जो रेडियो और टीवी के बेहतरीन कार्यक्रमों को दिया जाता है  सामाजिक सरोकार: 1- श्री त्रिपाठी भारत में श्रमजीवी पत्रकारों के सबसे पुराने और सबसे बड़े संगठन इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स IFWJ के राष्ट्रीय सचिव रहे. 2- उ. प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष रहे. अपने कार्यकाल में उन्होंने समाचार संकलन के कार्य को सुचारू बनाने के लिए राजनीतिक दलों , शासन और पुलिस के तालमेल से अनेक व्यवस्थागत सुधार किये. 3- यू.पी. प्रेस क्लब, लखनऊ के अध्यक्ष के रूप में श्री त्रिपाठी ने प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा बहालकर उसे समाज से जोड़ा. इससे प्रेस क्लब में साहित्यिक , सांस्कृतिक गतिविधियाँ बढ़ीं और आर्थिक निर्भरता आयी. 4 उत्तर प्रदेश पत्रकारिता संस्थान के उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में श्री त्रिपाठी ने सूचना के अधिकार एवं अन्य कई विषयों पर राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार कराये. 5 श्री त्रिपाठी लखनऊ शहर के पर्यावरण सुधार और गोमती सफाई के स्वैछिक आंदोलन में भी सक्रिय रहे हैं. 6 राम दत्त त्रिपाठी ने गंगा , यमुना और गोमती नदियों के प्रदूषण और पर्यावरण पर लगातार और गहराई से अध्ययन तथा लेखन किया है. लोकतंत्र , प्रेस की स्वतंत्रता , सामाजिक समता और सौहार्द , समाज कल्याण , ग्राम स्वराज्य तथा रचनात्मक कार्यों में विशेष अभिरुचि एवं सक्रियता से श्री त्रिपाठी को समाज में विशेष सम्मान और स्थान मिला है. शिक्षा – बी.ए., एल.एल.बी. इलाहाबाद विश्वविद्यालय. जन्म तिथि – 12 नवंबर 1953 . सम्पर्क सूत्र – 55 गुलिस्तां कालोनी, लखनऊ 226001. फोन – 0522 -2236762 मोबाइल – 98390-12810 E-Mail: ramdutt.tripathi@gmail.com

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